जब सपनों ने दस्तक दी
उस दिन सुबह से ही आसमान में बादल घिरे हुए थे, मानो मौसम भी जानता था कि आज कुछ टूटने वाला है। मैं, रोहन, अपनी टूटी हुई चप्पल पहनकर स्कूल के गेट की तरफ बढ़ रहा था, और मन में एक अजीब-सी बेचैनी घुली हुई थी। कारण साफ था — आज साइंस प्रोजेक्ट जमा करने का आखिरी दिन था, और मेरे पास न तो मॉडल बनाने के लिए पैसे थे, न ही सामान।
शर्मा मैडम ने एक हफ्ते पहले क्लास में ऐलान किया था, "सब बच्चे सोलर सिस्टम का मॉडल बनाकर लाएंगे। थर्मोकोल, रंग, तार — जो भी चाहिए, अपने माता-पिता से मंगवा लेना। यह प्रोजेक्ट आपके फाइनल नंबरों में जुड़ेगा।"
मैंने घर जाकर बड़ी हिम्मत जुटाकर पापा से बात की थी। वे उस समय रसोई की चौखट पर बैठे बीड़ी पी रहे थे, थकान उनके चेहरे पर साफ झलक रही थी। दिनभर की मज़दूरी के बाद उनकी आँखों में एक सूनापन उतर आता था, जिसे मैं बचपन से पहचानता आया था।
"पापा, स्कूल में एक प्रोजेक्ट बनाना है। थोड़े पैसे चाहिए, थर्मोकोल और रंग के लिए।"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस बीड़ी का एक लंबा कश लिया और आसमान की तरफ देखने लगे। उनकी चुप्पी शब्दों से ज़्यादा भारी थी। मुझे उसी पल समझ आ गया था कि जवाब न में है, मगर वे इसे कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। मैंने भी दोबारा नहीं पूछा। घर की माली हालत मुझसे छिपी नहीं थी — महीने के आखिरी हफ्तों में चावल-दाल की मात्रा भी कम हो जाती थी, यह मैं बचपन से देखता आया…
