अभाव में जीवन
पूरब की दिशा में आसमान अभी पूरी तरह उजला नहीं हुआ था। धूसर रंग की एक हल्की परत आकाश पर बिछी थी, जैसे किसी ने राख छिड़क दी हो और उसके नीचे कहीं सूरज दबा हो, धीरे-धीरे साँस ले रहा हो। गाँव के मुर्गों ने अभी-अभी बाँग देनी शुरू की थी, और उस बाँग की गूँज मिट्टी की दीवारों से टकराकर वापस लौट आती, जैसे सन्नाटे को तोड़ने का बहाना ढूँढ रही हो।
गंगा की झोंपड़ी गाँव के छोर पर खड़ी थी, जहाँ खेतों की सीमा शुरू होती और घरों की कतार खत्म हो जाती। मिट्टी की दीवारें कई जगह से झर चुकी थीं, और छत पर बिछी फूस इतनी पुरानी हो गई थी कि बारिश के दिनों में पानी की धार सीधे घर के भीतर उतर आती। एक कोने में टूटी हुई मिट्टी की हांडी रखी थी, दूसरे कोने में दो-चार बर्तन, जिन पर कालिख की मोटी परत जमी थी। यही गंगा का संसार था — छोटा, दरिद्र, पर अपनेपन से भरा हुआ।
गंगा की आँख खुली तो बाहर अभी भोर का उजाला ठीक से फैला नहीं था। वह कई सालों से इस वक्त उठने की आदी हो गई थी। नींद जैसे उसके शरीर से पहले ही निकल जाती, और मन पहले ही दिन की चिंताओं में डूब जाता। उसने करवट बदली, अपनी फटी हुई साड़ी के पल्लू को कसकर बाँधा, और उठ बैठी। शरीर में हल्का दर्द था — कल दिनभर खेत में काम करने का असर अब हड्डियों में उतर आया था। पर उसने उस दर्द को नज़रअंदाज़ करने की आदत बना ली थी, जैसे वह उसकी ज़िंदगी का ही एक हिस्सा हो, कोई अलग चीज़…
